कोई जलता कोई हँसता
कोई जलता कोई हँसता
दीप की सुंदर शिखा ने
शलभ का क्यों मन लुभाया
मुस्कराकर सिर डुलाकर
पास अपने क्यों बुलाया
नाच उठता क्यों पतिंगा
दौडता उर से लगाने
फिर झुलसकर, फिर सम्हलकर
फिर लपकता प्यार पाने
राख हो दो पंख सुंदर
खो गये सूनी निशा में
विवश आँखों से सरकता
चाहता घुलना शिखा में
तनिक दूरी पर गिरा निष्प्राण तन जब छटपटाकर
दीप हँसता ज्वाल हँसती
लो शिखा का स्नेह हँसता
कोई जलता कोई हँसता
दीप की सुंदर शिखा ने
शलभ का क्यों मन लुभाया
मुस्कराकर सिर डुलाकर
पास अपने क्यों बुलाया
नाच उठता क्यों पतिंगा
दौडता उर से लगाने
फिर झुलसकर, फिर सम्हलकर
फिर लपकता प्यार पाने
राख हो दो पंख सुंदर
खो गये सूनी निशा में
विवश आँखों से सरकता
चाहता घुलना शिखा में
तनिक दूरी पर गिरा निष्प्राण तन जब छटपटाकर
दीप हँसता ज्वाल हँसती
लो शिखा का स्नेह हँसता
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