कौन ?
तुम !
असमय ही आते हो !!
कर रहा था मैं तुम्हारी पूजा
और तुम आए कि सारा आन्नद भंग कर दिया
अवश्य मैं पूजा में यहाँ आने के लिए ही मना रहा था तुम्हें
पर कब ?
जब अभिमान में चूर हो मैं अंधकार में भटक जाऊँ
तब आना और हाथ थामकर
राह दिखाना
ठोकर खाऊँ ,गिर पडूँ
तब आना और उठाकर अपने
कोमल स्पर्श से पीडा दूर करना
और फिर छोड देना
करने देना फिर से तुम्हारी पूजा .
तुम !
असमय ही आते हो !!
कर रहा था मैं तुम्हारी पूजा
और तुम आए कि सारा आन्नद भंग कर दिया
अवश्य मैं पूजा में यहाँ आने के लिए ही मना रहा था तुम्हें
पर कब ?
जब अभिमान में चूर हो मैं अंधकार में भटक जाऊँ
तब आना और हाथ थामकर
राह दिखाना
ठोकर खाऊँ ,गिर पडूँ
तब आना और उठाकर अपने
कोमल स्पर्श से पीडा दूर करना
और फिर छोड देना
करने देना फिर से तुम्हारी पूजा .
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