शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

पतिंगा की.... स्थिति..२

कोई जलता कोई हँसता
कोई जलता कोई हँसता

एक अर्पित प्यार से तो(जब)
ज्वाल ने हँस खेल खेला
दीप सूना शुष्क बाती
धूम्र भी उठता अकेला
    (अब)
प्यार का परिहास देखा
सिहर उठी रजनी सुंदर
क्षोभ से भर खींच लेती
अपना श्यामांचल सरसर

फट गया नभ का ह्रदय भी
घूमता बस एक बादल
स्म्रति खोये प्यार की यह
दौड रही बनकर पागल
क्रूरता की विवशता पर
मौन हँसता विश्व सारा

हँस पडा रवि विहग हँसते
अमर असफल प्रेम हँसता
कोई जलता कोई जलता

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