(1)
ऊषा के मधु अच्ञल से,
क्यों देख मुझे मुस्काते हो ?
मेरा कोई रहा नहीं,
क्या इससे मुझे चिढ़ाते हो ?
दुख-संतप्त ह्रदय पर क्यों,
तुम बरछी फेंक चलाते हो ?
क्या इतने निर्लज्ज बने,
जो तनिक नहीं शर्माते हो ?
---शेष है--
हर कर्म ऐसा करो कि जिससे तेरा मान हो, हर कदम आगे बढे जो वो तेरी पहचान हो. कर्म से बन जाये पथ पर तेरे कदमो के निशां, मंजिलें बन जाय उनसे रोशन हर इंसान हो.