जीवन की विभीषिकाओं से हारकर
जब ह्रदय ने मनुष्य से कहा ...."भाग
चलो यहाँ से....दूर...क्षितिज के उस पार..
वहाँ चैन का स्वर्ग है ."
तभी मस्तिष्क ने रोक कर कहा......"ठहरो !
व्यर्थ होगा जाना ....क्षितिज तक भी नहीं
पहुँच सकोगे....क्षितिज के उस पार तो स्वप्नों
की स्रष्टि है .बलिदान करना सीखो ."
मनुष्य रुक गया और फिर सिर घुमाकर देखा
जीवन की ओर....अतीव ,नूतन द्रढता से....
और तभी क्रांति का बीज धरती में गिरा !
जब ह्रदय ने मनुष्य से कहा ...."भाग
चलो यहाँ से....दूर...क्षितिज के उस पार..
वहाँ चैन का स्वर्ग है ."
तभी मस्तिष्क ने रोक कर कहा......"ठहरो !
व्यर्थ होगा जाना ....क्षितिज तक भी नहीं
पहुँच सकोगे....क्षितिज के उस पार तो स्वप्नों
की स्रष्टि है .बलिदान करना सीखो ."
मनुष्य रुक गया और फिर सिर घुमाकर देखा
जीवन की ओर....अतीव ,नूतन द्रढता से....
और तभी क्रांति का बीज धरती में गिरा !
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