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फिर स्वाति काल आकर ही,
चातक की प्यास बुझाता था ।
मैं भी अनिमेष निरखता ,
पर प्यासा ही रह जाता था ।
फिर भी आशा तरु मेरा ,
दिन दूना बढ़ता जाता था ।
दुनिया में ढूँढ़ा करता ,
पर नैराश्य हाथ आता था ।
--शेष है-
फिर स्वाति काल आकर ही,
चातक की प्यास बुझाता था ।
मैं भी अनिमेष निरखता ,
पर प्यासा ही रह जाता था ।
फिर भी आशा तरु मेरा ,
दिन दूना बढ़ता जाता था ।
दुनिया में ढूँढ़ा करता ,
पर नैराश्य हाथ आता था ।
--शेष है-
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