रविवार, 4 अगस्त 2013

भक्त की आकाँक्षा(2)

                  (मदिरा सवैया)
राम बसे मन माहिं सदा अरु,दीप जले नित Kkन हिये.
शील दया क्षमता भर सुन्दर,पात्र सदा मधु पान किये.
कर्म करूँ नित लोक-हितेच्छुक,और सभी कुछ दान किये.
प्रेम भरा जब डोल फिरूँ तब,क्या जग में फल और जिये.

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