(मतगयंद सवैया)
नित्य करे दुख से अति रोदन हा ! यह भारत भूमि बेचारी .
खाकर ठोकर बैठ रही चुप और गँवा निज सम्पत्ति सारी .
भोजन-वस्त्र-विहीन पडी प्रभु ! मौत बिना मरती वह मारी .
हैं कर से चुडियां तक गायब और कहूँ अब क्या जगधारी ..
आलस त्याग बनो सब ही अब कर्मठ भारत के नर नारी .
क्लेश हरो मिल के अब तो सब है वह हा ! अति दीन दुखारी .
भारत-लाज रखो युवको तुम है बिनती यह तात हमारी .
राष्ट्र-हितार्थ जियो करके प्रण और बनो सब ही व्रतधारी ..
नित्य करे दुख से अति रोदन हा ! यह भारत भूमि बेचारी .
खाकर ठोकर बैठ रही चुप और गँवा निज सम्पत्ति सारी .
भोजन-वस्त्र-विहीन पडी प्रभु ! मौत बिना मरती वह मारी .
हैं कर से चुडियां तक गायब और कहूँ अब क्या जगधारी ..
आलस त्याग बनो सब ही अब कर्मठ भारत के नर नारी .
क्लेश हरो मिल के अब तो सब है वह हा ! अति दीन दुखारी .
भारत-लाज रखो युवको तुम है बिनती यह तात हमारी .
राष्ट्र-हितार्थ जियो करके प्रण और बनो सब ही व्रतधारी ..
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