(परवशता)
इसमें मेरी क्या है भूल!
यौवन ही क्यों दिया राम ने,विकसे क्यों मस्ती के फूल!
मदमाता क्यों पवन दौडकर,देता हठकर अँचल हूल !
रवि की किरणें अवसर पाकर,
घुस जाती हैं क्यों आ आकर !
भौंरे करिया क्यों मडराकर,
जबरन झूमें दाव लगाकर !
सघन पात सम बसन उढाकर,
क्रोध कटीली बाड लगाकर !
लुककर छिपकर आँख बचाकर,
कोशिश कर ली खूब छिपाकर,
बुझी हुई सी काम-ज्योति फिर,उकसाते क्यों बन अनुकूल!
मोह-जनित ये झूठ प्रेम से,भरमाते क्यों बन मन-शूल ! !
इसमें मेरी क्या है भूल ! !
इसमें मेरी क्या है भूल!
यौवन ही क्यों दिया राम ने,विकसे क्यों मस्ती के फूल!
मदमाता क्यों पवन दौडकर,देता हठकर अँचल हूल !
रवि की किरणें अवसर पाकर,
घुस जाती हैं क्यों आ आकर !
भौंरे करिया क्यों मडराकर,
जबरन झूमें दाव लगाकर !
सघन पात सम बसन उढाकर,
क्रोध कटीली बाड लगाकर !
लुककर छिपकर आँख बचाकर,
कोशिश कर ली खूब छिपाकर,
बुझी हुई सी काम-ज्योति फिर,उकसाते क्यों बन अनुकूल!
मोह-जनित ये झूठ प्रेम से,भरमाते क्यों बन मन-शूल ! !
इसमें मेरी क्या है भूल ! !
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