देश की राजधानी दिल्ली में इस बार अबोध बच्ची को शिकार बनाया गया . देश के अन्य हिस्सों में भी स्त्रियों के सतीत्व पर हमलों की बाढ आगई है और खासतौर से बच्चियों पर आफत टूट पडी है . ऐसा प्रतीत होता है जैसे कालचक्र उनके लिए ठीक न हो .
दिल्ली ही में माह दिसम्बर में दामिनी के साथ घटित घटना के बाद के जन आक्रोश और कठोर दण्डात्मक कानून के बाद भी इस प्रकार की घटनाओं का बढना चिंता का विषय है लेकिन सरकारें तो चिंतित तभी होती हैं जब उनकी सत्ता खतरे में आ जाए
आज सुबह टी.वी. में समाचारों के दौरान दिल्ली में एक लडकी ने यह स्वीकार किया कि यह ठीक है कि हम छोटे कपडे पहनते हैं और लोग इससे आकर्षित होते हैं लेकिन उस बच्ची का क्या दोष ,उसने तो ऐसा नहीं किया होगा .
यह सत्य है कि इन घटनाओं में अबोध बच्चियों का कोई दोष नहीं और न ही हो सकता है . वास्तविक दोषी स्वयं समाज ही है . सबसे पहले समाज को स्वयं के विचारों एवं सोच में बदलाव की पहल करनी चाहिए . स्त्रियों को जिस प्रकार से टी.वी.सीरियलों, फिल्मों आदि में दिखाया जाता है जिस तरह से कैमरों द्वारा उन्हें प्रस्तुत किया जाता है और जगह जगह अश्लील व उत्तेजित करने वाले अर्द्ध नग्न पोस्टर लगाये जाते हैं सर्वप्रथम समाज को इसका विरोध करना चाहिए और ऐसे लोगों का बहिष्कार किया जाना चाहिए जो नग्नता को परोसकर अपना व्यवसाय चलाना चाहते हैं . ऐसे लोगों की बातें बडी बडी होती हैं लेकिन सोच बहुत घटिया . और ऐसे लोग विरोध होने पर विरोध करने वालों को पिछडा, दकियानूसी आदि कहकर लोगों को बरगलाते हैं और टी.वी. न्यूज वाले वाद विवाद में उन्हें समर्थन करतें हैं, कभी कभी कोई ईमानदार भी दिखाई देता है .स्त्रियों के संबंध में सामाजिक सोच के विषय में मेरे ब्लाग के'काव्य खण्ड' में "औरत" शीर्षक में मेरे विचारों पर निगाह डालकर अपने सुझाव अवश्य देने का कष्ट करें .
स्त्रियों के सतीत्व से संबंधित अपराधों में अपराधियों को गोली मारने या फांसी देने से समस्या का समाधान नहीं होगा . वास्तविक समाधान आपराधिक सोच की उत्पत्ति को रोकने से होगा . इस पर ध्यान दिया जाना, विचार किया जाना और कार्य किया जाना आवश्यक है .
दिल्ली ही में माह दिसम्बर में दामिनी के साथ घटित घटना के बाद के जन आक्रोश और कठोर दण्डात्मक कानून के बाद भी इस प्रकार की घटनाओं का बढना चिंता का विषय है लेकिन सरकारें तो चिंतित तभी होती हैं जब उनकी सत्ता खतरे में आ जाए
आज सुबह टी.वी. में समाचारों के दौरान दिल्ली में एक लडकी ने यह स्वीकार किया कि यह ठीक है कि हम छोटे कपडे पहनते हैं और लोग इससे आकर्षित होते हैं लेकिन उस बच्ची का क्या दोष ,उसने तो ऐसा नहीं किया होगा .
यह सत्य है कि इन घटनाओं में अबोध बच्चियों का कोई दोष नहीं और न ही हो सकता है . वास्तविक दोषी स्वयं समाज ही है . सबसे पहले समाज को स्वयं के विचारों एवं सोच में बदलाव की पहल करनी चाहिए . स्त्रियों को जिस प्रकार से टी.वी.सीरियलों, फिल्मों आदि में दिखाया जाता है जिस तरह से कैमरों द्वारा उन्हें प्रस्तुत किया जाता है और जगह जगह अश्लील व उत्तेजित करने वाले अर्द्ध नग्न पोस्टर लगाये जाते हैं सर्वप्रथम समाज को इसका विरोध करना चाहिए और ऐसे लोगों का बहिष्कार किया जाना चाहिए जो नग्नता को परोसकर अपना व्यवसाय चलाना चाहते हैं . ऐसे लोगों की बातें बडी बडी होती हैं लेकिन सोच बहुत घटिया . और ऐसे लोग विरोध होने पर विरोध करने वालों को पिछडा, दकियानूसी आदि कहकर लोगों को बरगलाते हैं और टी.वी. न्यूज वाले वाद विवाद में उन्हें समर्थन करतें हैं, कभी कभी कोई ईमानदार भी दिखाई देता है .स्त्रियों के संबंध में सामाजिक सोच के विषय में मेरे ब्लाग के'काव्य खण्ड' में "औरत" शीर्षक में मेरे विचारों पर निगाह डालकर अपने सुझाव अवश्य देने का कष्ट करें .
स्त्रियों के सतीत्व से संबंधित अपराधों में अपराधियों को गोली मारने या फांसी देने से समस्या का समाधान नहीं होगा . वास्तविक समाधान आपराधिक सोच की उत्पत्ति को रोकने से होगा . इस पर ध्यान दिया जाना, विचार किया जाना और कार्य किया जाना आवश्यक है .
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