देश की राजधानी दिल्ली में माह दिसम्बर में एक छात्रा के साथ घटित घ्रणित,दुखद घटना को घटित हुए लगभग ४ माह का समय हो गया . घटना के पश्चात घटना के संबंध में अवश्यसम्भावी आक्रोश व प्रतिक्रिया
भी देखने को मिली.. महिलाओं व बच्चियों को भरपूर सुरक्षा व ऊन के साथ होने वाली अवैध घटनाओं के संबंध
में कठोर कदम व कठोर कानूनी कार्यवाही की बातें भी चलीं और इस हेतु सरकार को भी घेरनी की कोशिश से कुछ परिणाम भी दिखाई दिये...टी.वी.पर तर्क वितर्क हुए, समाचार पत्रों में भी लिखा गया ...किन्तु इस प्रकार की घटनाओं को रोका नहीं जा सका...बल्कि इतना हो हल्ला होने के बाद भी निरन्तर घटनायें होना जारी हैं...मलेरिया होने के बाद मच्छरदानी लगाने के स्वभाववश वह भी दबाव में कठोर दण्डात्मक कानून बनाने का प्रयास किया गया
ये घटनायें क्यों होती हैं और निरन्तर क्यों बढ रहीं हैं,इनके कारणों पर ईमानदारी से विचार ही नहीं किया गया अथवा विचार करने या विचार व्यक्त करने का साहस न तो इलेक्ट्रानिक मीडिया ने दिखाया और न ही किसी समाज सेवी ने तद् विषयक किसी भी प्रकार की क्रिया प्रतिक्रिया दी . राजनेताओं अथवा सरकारों से इसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती
अपराध अर्थात् अवैध व असामाजिक क्रत्य मानसिक विकारों और दुस्साहस के कारण ही होते हैं . चंचल मन उत्प्रेरक अवस्थाओं व माध्यमों के कारण नियंत्रण मुक्त हो जाता है जिससे मनुष्य की बुध्दि मन के वशीभूत विवेकशून्य हो अत्यधिक विक्रत अवस्था में पहुंच पथ.भ्रष्ट हो जाती है तो मनुष्य विवेकहीनतावश दुष्परिणामों की चिंता किये बिना दुष्क्रत्य करने की हदें पार कर जाता है और जब होश आता है तो उसे छिपाने के लिये अगला कदम गलत ही उठाता है .और कानून व शासन प्रशासन का भय न होने से आदमी दुस्साहसी हो जाता है .
मनुष्य पढा लिखा हो या अनपढ साधारणतः उसका मन विकारों की ओर ही दौडता है . विकार उत्पन्न करने वाले विषयों व माध्यमों एवं स्वयं पर रोक लगाने आदि की मांग मनुष्य स्वीकार ही नहीं कर सकता और इसीलिए ऐसे किसी प्रतिबंध के विरोध में स्वयं के पक्ष को न्याय संगत ठहराने के लिए तरह तरह के तर्क कुतर्क कर वह बहाने ढूढता है इसीलिए धर्मो में एवं विचारकों व उपदेशकों ने भी मन को नियंत्रित कर विवेक को जाग्रित रखने की बात कही है . अत्यधिक उन्मुक्तता प्रदान करने वाले अधिकारों का स्रजन सदैव ही स्वयं मनुष्य एवं समाज के लिए दुख दायी होता है
मनुष्य की बुद्धि को विकार ग्रस्त बनाने के लिए पहले अश्लील साहित्य को दोषी ठहराया जाता था किन्तु अब सिनेमा टी.वी.ने हदें ही पार कर दी हैं . पहले लोग हफ्ते में एक.दो बार वो भी कुछ ठीक सी फिल्म देखते थे अब टी.वी.व मोबाइल पर जब चाहें तब मन मष्तिक को विकारग्रस्त बनाने की भरपूर खुराक जब चाहे तब उपलब्ध है . टी.वी.के प्रभाव के संबंध में मैंने एक कविता सन् १९९१ में लिखी थी जिसे आप मेरे ब्लाग के 'काव्य' खण्ड के 'टी.वी.' शीर्षक' में पढ सकते हैं .
समाज में चरित्र की इस कदर गिरावट हुई है कि कुछ बचेगा भी या नहीं यह विचारणीय विषय है
युवा वर्ग को पथभ्रष्ट किया जा रहा है इसमें युवाओं का कोई दोष नहीं . उन्हें जो समाज द्वारा दिया जा रहा है वे भी ब्याज सहित वैसा ही समाज को लौटा रहे हैं . जब नग्नता,अश्लीलता, और फूहडता शब्दों,चित्रों व चलचित्रों के माध्यमों से खुलेआम निर्विघ्न परोसी जा रही हो तो बाल मन से लेकर परिपक्व आयु तक के लोगों के मन मस्तिष्क में विकार उत्पन्न होना स्वाभाविक है तिस पर मनुष्य के मस्तिष्क को चेतना शून्य कर दुस्साहसी बनाने वाली शराब सरकारों द्वारा पानी से भी अधिक शुलभ तरीकों से उपलब्ध कराई जा रही हो तो मनुष्य को अपराध के दलदल में गिरने से कोई नहीं रोक सकता .शराब माफियाओं के दबाव में इस पर प्रतिबंध के विषय में विचार भी सम्भव नहीं . स्त्री के सतीत्व को तार तार करने वाली अधिकांश घटनाओं में यह पाया गया है कि अपराधी शराब के नशे में थे . इस बिंदू को क्यों नहीं उठाया गया यह विचारणीय है .
देश में चारित्रिकपतन एवं संस्क्रति के विनाश के लिए हम पश्चिम को दोषी ठहराते हैं जबकि इस हेतु सरकारों के साथ वे लोग दोषी हैं जो रुपया कमाने की अंधी दौड में फूहड व मर्यादाहीन फिल्में ,सीरियल और गीत व न्रत्य समाज को दे रहे हैं . वास्तव में फिल्म उद्योग मानव मन की कमजोरियों का व्यवसाय है . फिल्म उद्योग वाले सफाई देते हुए कहते हैं कि जो जनता की मांग होती है वही दिखाते हैं . तो इनसे कोई ये पूंछे कि यदि"इनका बेटा जहर पीने की जिद करेगा तो ये क्या उसे जहर पिला देंगे ,कतई नहीं" . ये लोग तर्क में यह भी कहते हैं कि वे तो लोगों का मनोरंजन करते हैं . लडकियों से छेडछाड और स्त्रियों की लज्जा के फूहड प्रदर्शन आदि को मनोरंजन के साधन बना देने से ही तो सडकों पर आज स्त्रियों की यह हालत है . जब युवा क्रिकेटर लडकी पटाने के शब्दों के साथ मोबाइल फोन का ऐड करते दिखाये जायें और छोटे बडे सभी फिल्म अभिनेता यही सब करने के नये नये तरीके जनता को फिल्मों द्वारा बतायें तो शासन प्रशासन क्या समझता है कि लडकियां सडकों व स्कूल कालेजों में सुरक्षित रह सकती हैं जब ऐसे लोग समाज के प्रेरणा स्त्रोत होंगे तो समाज को गर्त में जाने से कोई नहीं रोक सकता . यदि यह कहा जाये कि विक्रत बुद्धि समाज पर हावी हो गई है तो अतिश्योक्ति न होगी . शासन को इससे कोई मतलब नहीं कानून बने हुए हैं जिसे कोई परेशानी है कानूनी कार्यवाही करे .उन्हें टैक्स मिलता जाये . उनकी सत्ता को भर चुनौती न दें
,,,,,,जागना व जगाना स्वयं समाज को ही है अन्यथा स्त्री वर्ग और गर्त में जाते समाज को बचाना असम्भव होगा .