रविवार, 28 अप्रैल 2013

औरत

एक औरत पैसे के लिए कोठे पर नाचती है ,
अपने अंग वस्त्रों में छुपाती है .
सीमित दायरे में लोगों का मन बहलाती है,
तो वह वैश्या कहलाती है .
समाज में हेय द्रष्टि से देखी जाती है,
लूटी पीटी व प्रताडित की जाती है
नारी समाज पर कलंक व धब्बा कहलाती है

दूसरी औरत पैसे के लिए पर्दे पर नाचती है
वस्त्र उतारती है और अंग दिखाती है
करोडों लोगों  का मन बहलाती है
तो नाइका कहलाती है
समाज में पूजी जाती है
पुरुस्क्रत व सम्मानित की जाती है
नारी समाज की पथ प्रदर्शिका कहलाती है

    इस समाज ने औरत औरत में ये फर्क क्यों किया है
    वो भी तो माँ बहिन या बेटी है
     उसने इस रूप को मजबूरी में जिया है....... मजबूरी में जिया है

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

सुसुप्त समाज जागो

देश की राजधानी दिल्ली में इस बार अबोध बच्ची को शिकार बनाया गया . देश के अन्य हिस्सों में भी स्त्रियों के सतीत्व पर हमलों की बाढ आगई है और खासतौर से बच्चियों पर आफत टूट पडी है . ऐसा प्रतीत होता है जैसे कालचक्र उनके लिए ठीक न हो .
                                                दिल्ली ही में माह दिसम्बर में दामिनी के साथ घटित घटना के बाद के जन आक्रोश और कठोर दण्डात्मक कानून के बाद भी इस प्रकार की घटनाओं का बढना चिंता का विषय है लेकिन सरकारें तो चिंतित तभी होती हैं जब उनकी सत्ता खतरे में आ जाए
                                                   आज सुबह टी.वी. में समाचारों के दौरान दिल्ली में एक लडकी ने यह स्वीकार किया कि यह ठीक है कि हम छोटे कपडे पहनते हैं और लोग इससे आकर्षित होते हैं लेकिन उस बच्ची का क्या दोष ,उसने तो ऐसा नहीं किया होगा .
                                                      यह सत्य है कि इन घटनाओं में अबोध बच्चियों का कोई दोष नहीं और न ही हो सकता है . वास्तविक दोषी स्वयं समाज ही है . सबसे पहले समाज को स्वयं के विचारों एवं सोच में बदलाव की पहल करनी चाहिए . स्त्रियों को जिस प्रकार से टी.वी.सीरियलों, फिल्मों आदि में दिखाया जाता है जिस तरह से कैमरों द्वारा उन्हें प्रस्तुत किया जाता है और जगह जगह अश्लील व उत्तेजित करने वाले अर्द्ध नग्न  पोस्टर लगाये जाते हैं सर्वप्रथम समाज को इसका विरोध करना चाहिए और ऐसे लोगों का बहिष्कार किया जाना चाहिए जो नग्नता को परोसकर अपना व्यवसाय चलाना चाहते हैं . ऐसे लोगों की बातें बडी बडी होती हैं लेकिन सोच बहुत घटिया . और ऐसे लोग विरोध होने पर विरोध करने वालों को पिछडा, दकियानूसी आदि कहकर लोगों को बरगलाते हैं और टी.वी. न्यूज वाले वाद विवाद में उन्हें समर्थन करतें हैं, कभी कभी कोई ईमानदार भी दिखाई देता है .स्त्रियों के संबंध में सामाजिक सोच के विषय में मेरे ब्लाग के'काव्य खण्ड' में "औरत" शीर्षक में मेरे विचारों पर निगाह डालकर अपने सुझाव अवश्य देने का कष्ट करें .
                                                                                                                                    स्त्रियों के सतीत्व से संबंधित अपराधों में अपराधियों को गोली मारने या फांसी देने से समस्या का समाधान नहीं होगा . वास्तविक समाधान आपराधिक सोच की उत्पत्ति को रोकने से होगा . इस पर ध्यान दिया जाना, विचार किया जाना और कार्य किया जाना आवश्यक है .
                                          

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

न्याय की देवी

न्याय की देवी आँखें खोलो देखो बाहर भी आकर
दिया तले अँधेरा कितना सोचो ये अंदर जाकर

प्रथम कदम जब रखता याचक इस मंदिर दर पर लाकर
कितना अन्याय सहन करता वह अंतिम बिंदू तक जाकर
जिस न्याय को पाने आता वो  क्या  उसे मिल पाता है
या यूनिट के चक्कर में फंस डिस्पोजल पा जाता है
क्या (क्या) बयां करूं उस दिल की जो मलहम की खातिर आता है
दूषित हुई व्यवस्था वश वह बडा जख्म ले जाता है
हे देवी क्या इसी दर्द वश नम हो बंद हुई हैं आँखें
दर्द कहो हमसे तुम अपना आओ हम तुम मिलकर बाटें

(निर्धारित कार्य उपरांत यूनिट बनता है और निर्धारित यूनिट
उपरांत बोनस मिलता है)

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

भौतिक जगत के लिए चरित्र सबसे मूल्यवान है
पारलौकिक जगत के लिए मन का भाव महत्वपूर्ण है

भारत माँ की पुकार

सुनो लाल देश के ये माँ तुम्हें पुकारती
           जुल्मों से दबी हुई ये दर्द से कराहती .सुनो लाल......
किसी ने छोडा धर्म तो किसी ने संस्कार को
           कोई तोडे देश को (तो) कोई माँ के प्यार को
कोइ कोइ लाल देखो दुश्मन संग डोलता
           भारत माँ की आबरू को रुपयों से तोलता
सिंदूर पोंछता  कोई आंचल कोई नोंचता
           लूटता खसोटता है माँ का खून चूसता .सुनो लाल.......

आबरू लुट रही तेरी माँ की देख लाल
          ( क्या)खून पानी हो गया  जो नहीं उसमें उबाल
गहरी नींद सोया है या(कि) तू मदहोश है
           बात क्या है मेरे लाल जो तू खामोश है
आत्मा झकझोरती माँ है तुम्हें धिक्कारती
           क्रांति की मशाल ले ये माँ तुम्हें पुकारती .सुनो लाल........

रविवार, 7 अप्रैल 2013

कर्म व सफलता के अहंकार का त्याग करें .
प्रतिदिन रात्रि में आत्मविश्लेषण अवश्य करना चाहिए .
स्वयं(मैं) से कम या अतिशय स्नेह ही दुख का मूल कारण है.

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

टी.वी.के दुष्प्रभाव

संचार के माध्यम हैं समाज उत्थान के , टी.वी. सिखा रहे सब गुर डांस के
फिल्म फिल्म प्यार इश्क बच्चे खेल खेलते हैं ,रेप डाका लूट पाट कामसारे सीखते हैं
तुलसी कबीर गांधी राम श्याम भूल गये, परियों की कहानियां गुड्डे गुडिया छूट गये
रेप सांग ब्रेक डांस करते घर स्कूल में, बुद्धि विलास क्विज सभी फिल्मी रूप में
मां बहन भाभी चाची रिश्ते सब भूल गये, तू चीज बडी है मस्त मस्त के बोल अब सीख गये
समाज उत्थान के नये रूप सभी देख लो,इश्क के तरीके सारे अब बच्चों से सीख लो 

स्त्रियों के वास्तविक अपराधी

देश की राजधानी दिल्ली में माह दिसम्बर में एक छात्रा के साथ घटित घ्रणित,दुखद घटना को घटित हुए लगभग ४ माह का समय हो गया . घटना के पश्चात घटना के संबंध में अवश्यसम्भावी आक्रोश व प्रतिक्रिया
भी देखने को मिली.. महिलाओं व बच्चियों को भरपूर सुरक्षा व ऊन के साथ होने वाली अवैध घटनाओं के संबंध
में कठोर कदम व कठोर कानूनी कार्यवाही की बातें भी चलीं और इस हेतु सरकार को भी घेरनी की कोशिश से कुछ परिणाम भी दिखाई दिये...टी.वी.पर तर्क वितर्क हुए, समाचार पत्रों में भी लिखा गया ...किन्तु इस प्रकार की घटनाओं को रोका नहीं जा सका...बल्कि इतना हो हल्ला होने के बाद भी निरन्तर घटनायें होना जारी हैं...मलेरिया होने के बाद मच्छरदानी लगाने के स्वभाववश वह भी दबाव में कठोर दण्डात्मक कानून बनाने का प्रयास किया गया
                              ये घटनायें क्यों होती हैं और निरन्तर क्यों बढ रहीं हैं,इनके कारणों पर ईमानदारी से विचार ही नहीं किया गया अथवा विचार करने या विचार व्यक्त करने का साहस न तो इलेक्ट्रानिक मीडिया ने दिखाया और न ही किसी समाज सेवी ने तद् विषयक किसी भी प्रकार की क्रिया प्रतिक्रिया दी . राजनेताओं अथवा सरकारों से इसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती
                                                                                    अपराध अर्थात् अवैध व असामाजिक क्रत्य मानसिक विकारों और दुस्साहस के कारण ही होते हैं . चंचल मन उत्प्रेरक अवस्थाओं व माध्यमों के कारण नियंत्रण मुक्त हो जाता है जिससे मनुष्य की बुध्दि मन के वशीभूत विवेकशून्य हो अत्यधिक विक्रत अवस्था में पहुंच पथ.भ्रष्ट हो जाती है तो मनुष्य विवेकहीनतावश दुष्परिणामों की चिंता किये बिना दुष्क्रत्य करने की हदें पार कर जाता है और जब होश आता है तो उसे छिपाने के लिये अगला कदम गलत ही उठाता है .और कानून व शासन प्रशासन का भय  न होने से आदमी दुस्साहसी हो जाता है .
                                                                                                            मनुष्य पढा लिखा हो या अनपढ साधारणतः उसका मन विकारों की ओर ही दौडता है . विकार उत्पन्न करने वाले विषयों व माध्यमों एवं स्वयं पर रोक लगाने आदि की मांग मनुष्य स्वीकार ही नहीं कर सकता और इसीलिए ऐसे किसी प्रतिबंध के विरोध में स्वयं के पक्ष को न्याय संगत ठहराने के लिए तरह तरह के तर्क कुतर्क कर वह बहाने ढूढता है इसीलिए धर्मो में एवं विचारकों व उपदेशकों ने भी मन को नियंत्रित कर विवेक को जाग्रित रखने की बात कही है . अत्यधिक उन्मुक्तता प्रदान करने वाले अधिकारों का स्रजन सदैव ही स्वयं मनुष्य एवं समाज के लिए दुख दायी होता है
                    मनुष्य की बुद्धि को विकार ग्रस्त बनाने के लिए पहले अश्लील साहित्य को दोषी ठहराया जाता था किन्तु अब सिनेमा टी.वी.ने हदें ही पार कर दी हैं . पहले लोग हफ्ते में एक.दो बार वो भी कुछ ठीक सी फिल्म देखते थे अब टी.वी.व मोबाइल पर जब चाहें तब मन मष्तिक को विकारग्रस्त बनाने की भरपूर खुराक जब चाहे तब उपलब्ध है . टी.वी.के प्रभाव के संबंध में मैंने एक  कविता सन् १९९१ में लिखी थी जिसे आप मेरे ब्लाग के 'काव्य' खण्ड के  'टी.वी.' शीर्षक' में पढ सकते हैं .
                   समाज में चरित्र की इस कदर गिरावट हुई है कि कुछ बचेगा भी या नहीं यह विचारणीय विषय है
युवा वर्ग को पथभ्रष्ट किया जा रहा है इसमें युवाओं का कोई दोष नहीं . उन्हें जो समाज द्वारा दिया जा रहा है वे भी ब्याज सहित वैसा ही समाज को लौटा रहे हैं . जब नग्नता,अश्लीलता, और फूहडता शब्दों,चित्रों व चलचित्रों के माध्यमों से खुलेआम निर्विघ्न परोसी जा रही हो तो बाल मन से लेकर परिपक्व आयु तक के लोगों के मन मस्तिष्क में विकार उत्पन्न होना स्वाभाविक है तिस पर मनुष्य के मस्तिष्क को चेतना शून्य कर दुस्साहसी बनाने वाली शराब सरकारों द्वारा पानी से भी अधिक शुलभ तरीकों से उपलब्ध कराई जा रही हो तो मनुष्य को अपराध के दलदल में गिरने से कोई नहीं रोक सकता .शराब माफियाओं के दबाव में इस पर प्रतिबंध के विषय में विचार भी सम्भव नहीं . स्त्री के सतीत्व को तार तार करने वाली अधिकांश घटनाओं में  यह पाया गया है कि अपराधी शराब के नशे में थे . इस बिंदू को क्यों नहीं उठाया गया यह विचारणीय है .
                                         देश में चारित्रिकपतन एवं संस्क्रति के विनाश के लिए हम पश्चिम को दोषी ठहराते हैं जबकि इस हेतु  सरकारों के साथ वे लोग दोषी हैं जो रुपया कमाने की अंधी दौड में फूहड व मर्यादाहीन फिल्में ,सीरियल और गीत व न्रत्य समाज को दे रहे हैं . वास्तव में फिल्म उद्योग मानव मन की कमजोरियों का व्यवसाय है . फिल्म उद्योग वाले  सफाई देते हुए कहते हैं कि जो जनता की मांग होती है वही दिखाते हैं . तो इनसे कोई ये पूंछे कि यदि"इनका बेटा जहर पीने की जिद करेगा तो ये क्या उसे जहर पिला देंगे ,कतई नहीं" . ये लोग तर्क में यह भी कहते हैं कि वे तो लोगों का मनोरंजन करते हैं . लडकियों से छेडछाड और स्त्रियों की लज्जा के फूहड प्रदर्शन आदि को मनोरंजन के साधन बना देने से ही तो सडकों पर आज स्त्रियों की यह हालत है . जब युवा क्रिकेटर लडकी पटाने के शब्दों के साथ मोबाइल फोन का ऐड करते दिखाये जायें और छोटे बडे सभी फिल्म अभिनेता यही सब करने के नये नये तरीके जनता को फिल्मों द्वारा बतायें तो शासन प्रशासन क्या समझता है कि लडकियां सडकों व स्कूल कालेजों में सुरक्षित रह सकती हैं जब ऐसे लोग समाज के प्रेरणा स्त्रोत होंगे तो समाज को गर्त में जाने से कोई नहीं रोक सकता . यदि यह कहा जाये कि विक्रत बुद्धि समाज पर हावी हो गई है तो अतिश्योक्ति न होगी . शासन को इससे कोई मतलब नहीं  कानून बने हुए हैं जिसे कोई परेशानी है कानूनी कार्यवाही करे .उन्हें टैक्स मिलता जाये . उनकी सत्ता को भर चुनौती न दें
                        ,,,,,,जागना व जगाना स्वयं समाज को ही है अन्यथा स्त्री वर्ग और गर्त में जाते समाज को बचाना असम्भव होगा .