रविवार, 23 मार्च 2014

विस्मृति से मधुस्मृति की ओर

निधि मेरी वह भाग चुकी थी
           मुझ घोर नराधम दुष्टी से।
मुझ दानव-नर की कलुषमयी
           काली कंकाली जगती से ।।
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वह मुझको भूल चुकी थी
           पर मुझमें थी पहले जैसी।
वह मेरे दिल की रानी थी
           उस भोली की विस्मृति कैसी।।
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मैं उसे छिपाये जाता था
            अपने उर के अंतस्तल में।
वह मानो दूर भागती थी
           मुझको व्याकुल कर पलको में।।
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उच्छवासों की घोर घटाएँ
            संतप्त ह्रदय पर थी छाईं ।
थी तमंसाकार दिशाएँ सब
            प्रलयांकर दृश्य बना लाईं।।
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फिर जोड़ कर-युगल खड़ा हुआ
             आराध्य देव के सम्मुख मैं.
प्रभु मेरी साध करो पूरी
            यह मना रहा था प्रति क्षण मैं।।
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विनती प्रभु ने सुन ली मेरी
               आहें ले बह चली हवायें ।
उनको स्पर्श किया द्रवित हुई
                आँसू बन चू पड़ी घटायें ।।
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जब स्वच्छ नीलिमा प्रकट हुई
                निधि हीरक मुक्ता ले आई।
वह आज स्वर्ग की रानी है
                 पर दिल में मधुस्मृति सी छाई।।


रविवार, 16 मार्च 2014

होली आई रे

होलि आई रे रस लाइ है रस रंग के संग
कोई मले गुलाल गाल पे कोई डारे रंग---होली

रँग बिरंगे चेहरे सबके मन रँग लो प्यारे
झूम उठे रस रँग मेँ डूबे बाँह-बाँह डारे
डोल रहा है मेरा मन भी बिन पिये ही भंग---होली

दहन करें मिल होलिका में बुरे भाव सारे
गले मिलेँ औ धो डालेँ मन बिच मैल हमारे
सँग-सँग आओ छोड़ के प्यारे जाति भेद की जँग--होली


     सभी को होली की शुभ-कामनायें ।

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

एक प्रश्न मन से

   क्या करूँगा रूप तेरे
   नैन में कैसे बसाऊँ ?
   ये कलुष क्षण हैं बता दे
   उर तुझे कैसे लगाऊँ ?

   जल रही है आज भी जो
   आग सदियों से ह्रदय में
   धुल न पाई एक क्षण जो
   स्निग्ध शीतल शांतलय में
चाहते हो आज तुम ही
क्या उसे मैं ही बुझाऊँ ।----क्या करूँगा

   ढूड़ता गिरता-गिराता
   आ गया मैं द्वार तेरे
   नैन आतुर जी विकल है
   क्यों छिपे फिर प्यार मेरे ?
हो कहाँ ? बीती सुनो तो
आज फिर जी भर सुनाऊं ।--क्या करूँगा

   आश भर-भर जो पिलाय़ी
   भूलना ही था उन्हें क्या ?
   आ गया फिर भी नहीं है
   एक कोना भी मुझे क्या ?
सोचते क्यों , चाहते क्या
द्वार से मैं लौट जाऊँ ।--क्या करूँगा
 
 
   

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

आज कैसे गीत गाऊँ ?

आज कैसे गीत गाऊँ ?/

   पास थी प्रतिमा वही पर
   था कहीं पर सो रहा में
   अब जगा क्यों देर कर जब
   हाय ! बेबस  रो रहा  मैं ?
ये गरम बूंदे छिपाये हैं
कथा मैं क्या सुनाऊँ ?    --आज--

   धुल रहे हैं आँसुओं से
   भूत के वे चित्र प्यारे
   छिप गये थे जो जगाकर
   मौन गीतों को हमारे
देखना चाहूँ उन्हें फिर
पर कहो कैंसे सजाऊँ ? ---आज--

   गीत जिस पर नाचते थे
   हूँ वही वीणा अकेली
   तार टूटे और उलझे
   धूल खाती हूँ अकेली
शून्य वीणा , स्वर भरूँ ?
कोई नहीं , किसको रिझाऊँ ? --आज--

   तुम गये सब साज लेकर
   मिट चुकी संसृति हमारी
   झूठ का आलम बसाकर
   ढूँढता हूँ छबि तुम्हारी
ज्ञात है भ्रम में पड़ा हूँ
पर कहो कैसे भुलाऊँ ? --आ----


रविवार, 2 फ़रवरी 2014

-:जीवन:-

यह जीवन एक कहानी है ,
               जो बिखरी जग के कण-कण में ।
जिसका ओर न छोर कहीं है ,
               जो बढती  जाती  छण-छण  में ।
यह जीवन सुंदर वीणा है ,
               जो  तुम्हें  बजाना  ही  होगी ।
सब जगती की सुध बिसराकर ,
              यह तुम्हें  सुनाना  ही  होगी ।
यह जीवन लम्बी एक सफर ,
              युग-युग तक चलते जाना है ।
धर्म- अधर्म दो मार्ग दीर्घ ,
              बस उन पर  बढते  जाना  है ।
इक पाप-पुण्य की गठरी ही ,
              हर दम साथ  तुम्हारा  देगी ।
बस राम- नाम की ही लाठी ,
              तुमको 'उस' तक पहुँचा देगी ।
यह जीवन गूढ़ समस्या है ,
              जिसको सुलझाना  ही  होगा ।
जन्म-जन्म के बाद सही पर ,
              मोक्ष तुम्हें  पाना  ही  होगा ।













शनिवार, 25 जनवरी 2014

जीवन दीप

            दीप जलते जा रहे हो !
पूस, अमावस फिर अर्ध निशा
निस्तब्ध ठिठुरती अँधियारी
शालों में लिपटे धनिक दीन-
की काँप उठी जगती सारी
           किस अदृश्य के डूबे पथ पर
           अपना प्रकाश बिछा रहे हो

यह क्या ? किस कोने से आती
कवित झंनन झन की झंकार
गाने का उपक्रम कर कोई
क्या रुदन का रचता संसार
           विस्मय है क्यों चुप थे अब तक
           फिर क्यों गाने जा रहे हो ?

चंचल शैशव गया फुदकता
पर पा न सके मंजुल दुलार
अब यौवन भी गंभीर बना
पर मिला तुम्हें कब मधुर  प्यार
           क्या अनंत से ही कुछ पाने
           तन जलाते जा रहे हो            

सोमवार, 20 जनवरी 2014

दीप तेरा मत जला--

बुझ जायेगा दीप तेरा
                  मत जला रे बावरे !

   पास फिर भी दूर ही वह,
   स्नेह भींगा भी जलेगा ।
   जल भरा तेरा निरंतर ,
   उर धधकता ही रहेगा ।

हो क्षीण अस्तित्व तेरा
                  क्या बचेगा बावरे ?
 
   जल उठेगा ताल देकर ,
   झूमती सी लौ रहेगी ।
   नाच उठेगा तू पागल ,
   गीत में श्वासें बहेंगीं ।

सहसा होगा गीत तेरा
                     चुप कहीं रे बावरे !

  पावसी श्यामा निशा में ,
  घोर घन झुक झुक हँसेंगे ।
  चीखती झंझा बहेगी ,
  कौन के कर ओट देंगे ।

जब बुलायेगा प्रिय तेरा
                      आह ले ले बावरे !

  प्रखरतम फिर मेहलों से ,
  निर्दय खिलवाड़ करेगा ।
  तोड़ देगी दम; विवश ,
  तू दूर से देखा करेगा ।

दौड़ेगा तू जब अँधेरा
                 छा चुकेगा बावरे !
                 मत जला रे बावरे !