निधि मेरी वह भाग चुकी थी
मुझ घोर नराधम दुष्टी से।
मुझ दानव-नर की कलुषमयी
काली कंकाली जगती से ।।
- - -
वह मुझको भूल चुकी थी
पर मुझमें थी पहले जैसी।
वह मेरे दिल की रानी थी
उस भोली की विस्मृति कैसी।।
- - -
मैं उसे छिपाये जाता था
अपने उर के अंतस्तल में।
वह मानो दूर भागती थी
मुझको व्याकुल कर पलको में।।
- - -
उच्छवासों की घोर घटाएँ
संतप्त ह्रदय पर थी छाईं ।
थी तमंसाकार दिशाएँ सब
प्रलयांकर दृश्य बना लाईं।।
- - -
फिर जोड़ कर-युगल खड़ा हुआ
आराध्य देव के सम्मुख मैं.
प्रभु मेरी साध करो पूरी
यह मना रहा था प्रति क्षण मैं।।
- - -
विनती प्रभु ने सुन ली मेरी
आहें ले बह चली हवायें ।
उनको स्पर्श किया द्रवित हुई
आँसू बन चू पड़ी घटायें ।।
- - -
जब स्वच्छ नीलिमा प्रकट हुई
निधि हीरक मुक्ता ले आई।
वह आज स्वर्ग की रानी है
पर दिल में मधुस्मृति सी छाई।।
मुझ घोर नराधम दुष्टी से।
मुझ दानव-नर की कलुषमयी
काली कंकाली जगती से ।।
- - -
वह मुझको भूल चुकी थी
पर मुझमें थी पहले जैसी।
वह मेरे दिल की रानी थी
उस भोली की विस्मृति कैसी।।
- - -
मैं उसे छिपाये जाता था
अपने उर के अंतस्तल में।
वह मानो दूर भागती थी
मुझको व्याकुल कर पलको में।।
- - -
उच्छवासों की घोर घटाएँ
संतप्त ह्रदय पर थी छाईं ।
थी तमंसाकार दिशाएँ सब
प्रलयांकर दृश्य बना लाईं।।
- - -
फिर जोड़ कर-युगल खड़ा हुआ
आराध्य देव के सम्मुख मैं.
प्रभु मेरी साध करो पूरी
यह मना रहा था प्रति क्षण मैं।।
- - -
विनती प्रभु ने सुन ली मेरी
आहें ले बह चली हवायें ।
उनको स्पर्श किया द्रवित हुई
आँसू बन चू पड़ी घटायें ।।
- - -
जब स्वच्छ नीलिमा प्रकट हुई
निधि हीरक मुक्ता ले आई।
वह आज स्वर्ग की रानी है
पर दिल में मधुस्मृति सी छाई।।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें