क्या करूँगा रूप तेरे
नैन में कैसे बसाऊँ ?
ये कलुष क्षण हैं बता दे
उर तुझे कैसे लगाऊँ ?
जल रही है आज भी जो
आग सदियों से ह्रदय में
धुल न पाई एक क्षण जो
स्निग्ध शीतल शांतलय में
चाहते हो आज तुम ही
क्या उसे मैं ही बुझाऊँ ।----क्या करूँगा
ढूड़ता गिरता-गिराता
आ गया मैं द्वार तेरे
नैन आतुर जी विकल है
क्यों छिपे फिर प्यार मेरे ?
हो कहाँ ? बीती सुनो तो
आज फिर जी भर सुनाऊं ।--क्या करूँगा
आश भर-भर जो पिलाय़ी
भूलना ही था उन्हें क्या ?
आ गया फिर भी नहीं है
एक कोना भी मुझे क्या ?
सोचते क्यों , चाहते क्या
द्वार से मैं लौट जाऊँ ।--क्या करूँगा
नैन में कैसे बसाऊँ ?
ये कलुष क्षण हैं बता दे
उर तुझे कैसे लगाऊँ ?
जल रही है आज भी जो
आग सदियों से ह्रदय में
धुल न पाई एक क्षण जो
स्निग्ध शीतल शांतलय में
चाहते हो आज तुम ही
क्या उसे मैं ही बुझाऊँ ।----क्या करूँगा
ढूड़ता गिरता-गिराता
आ गया मैं द्वार तेरे
नैन आतुर जी विकल है
क्यों छिपे फिर प्यार मेरे ?
हो कहाँ ? बीती सुनो तो
आज फिर जी भर सुनाऊं ।--क्या करूँगा
आश भर-भर जो पिलाय़ी
भूलना ही था उन्हें क्या ?
आ गया फिर भी नहीं है
एक कोना भी मुझे क्या ?
सोचते क्यों , चाहते क्या
द्वार से मैं लौट जाऊँ ।--क्या करूँगा
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