शुक्रवार, 7 मार्च 2014

एक प्रश्न मन से

   क्या करूँगा रूप तेरे
   नैन में कैसे बसाऊँ ?
   ये कलुष क्षण हैं बता दे
   उर तुझे कैसे लगाऊँ ?

   जल रही है आज भी जो
   आग सदियों से ह्रदय में
   धुल न पाई एक क्षण जो
   स्निग्ध शीतल शांतलय में
चाहते हो आज तुम ही
क्या उसे मैं ही बुझाऊँ ।----क्या करूँगा

   ढूड़ता गिरता-गिराता
   आ गया मैं द्वार तेरे
   नैन आतुर जी विकल है
   क्यों छिपे फिर प्यार मेरे ?
हो कहाँ ? बीती सुनो तो
आज फिर जी भर सुनाऊं ।--क्या करूँगा

   आश भर-भर जो पिलाय़ी
   भूलना ही था उन्हें क्या ?
   आ गया फिर भी नहीं है
   एक कोना भी मुझे क्या ?
सोचते क्यों , चाहते क्या
द्वार से मैं लौट जाऊँ ।--क्या करूँगा
 
 
   

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