-गतांक से आगे-
समझ भला पाया होता भी
तो लौट वहाँ कैसे जाता
लहरें तरणी ले बढ़ती थीं
स्थिर हो प्राण कहाँ पाता !
पतवारहीन वह यात्रा मेरी
मानो जगत निकाला था ।---स्वयं---
उद्देश्यहीन घनतम विलीन
जीवन नौका दौड़ रही थी
मीलित नयनों में ध्यान बनी
छबि पल पल चमक रही थी
उस निविड़ तम मय काल में तो
मेरा वही उजाला था !---स्वयं----
---शेष------
समझ भला पाया होता भी
तो लौट वहाँ कैसे जाता
लहरें तरणी ले बढ़ती थीं
स्थिर हो प्राण कहाँ पाता !
पतवारहीन वह यात्रा मेरी
मानो जगत निकाला था ।---स्वयं---
उद्देश्यहीन घनतम विलीन
जीवन नौका दौड़ रही थी
मीलित नयनों में ध्यान बनी
छबि पल पल चमक रही थी
उस निविड़ तम मय काल में तो
मेरा वही उजाला था !---स्वयं----
---शेष------
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