शैशव
मेरे जीवन के प्रथम तीर
स्वयं प्रकाश उजाले वाला था
अनुपम ज्योतिमयी वह काया
मेरे जीवन में आई थी ,
शांतिमयी शीतल आभा सी
मेरी संसृति पर छाई थी ,
मैं सोच रहा हूँ अब भी तो
कैसा रूप निराला था !---स्वयं
मैं तो निरख रहा था चुप
वह रूप राशि केवल निर्मल !
मस्तिष्क क्षुद्र तो निर्मल था
बेचारा मुग्ध ह्रदय निर्बल !
फिर स्पर्श भला कैसे होता
सब कुछ भोला भाला था !---स्वयं
-- शेष --
मेरे जीवन के प्रथम तीर
स्वयं प्रकाश उजाले वाला था
अनुपम ज्योतिमयी वह काया
मेरे जीवन में आई थी ,
शांतिमयी शीतल आभा सी
मेरी संसृति पर छाई थी ,
मैं सोच रहा हूँ अब भी तो
कैसा रूप निराला था !---स्वयं
मैं तो निरख रहा था चुप
वह रूप राशि केवल निर्मल !
मस्तिष्क क्षुद्र तो निर्मल था
बेचारा मुग्ध ह्रदय निर्बल !
फिर स्पर्श भला कैसे होता
सब कुछ भोला भाला था !---स्वयं
-- शेष --
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