यह पुरातन गान मेरा ।
सो रही इसमें व्यथाएँ
ज्यों क्षितिज पर तारिकाएँ,
प्राण-सर की हर लहर पर
लिख गईं कितनि कथाएँ,
श्राप पाये, किन्तु कण कण
में बसा वरदान मेरा ।--यह पुरातन----
मिट चुका वह नीड़ मेरा
शून्य ही अब है बसेरा ,
निविड़ तम में आज मैंने
पा लिया है फिर सवेरा,
अब न व्याकुल हो गगन में
दौड़ता है गान मेरा ।यह पुरातन----
छाँय बिन है पंथ सूना
किंतु है उत्साह दूना ,
आज किस नव चेतना में
चाहता हूँ व्योम छूना ,
क्यों लिपट अपमान से मन
कह रहा सम्मान मेरा । यह पुरातन ---
सो रही इसमें व्यथाएँ
ज्यों क्षितिज पर तारिकाएँ,
प्राण-सर की हर लहर पर
लिख गईं कितनि कथाएँ,
श्राप पाये, किन्तु कण कण
में बसा वरदान मेरा ।--यह पुरातन----
मिट चुका वह नीड़ मेरा
शून्य ही अब है बसेरा ,
निविड़ तम में आज मैंने
पा लिया है फिर सवेरा,
अब न व्याकुल हो गगन में
दौड़ता है गान मेरा ।यह पुरातन----
छाँय बिन है पंथ सूना
किंतु है उत्साह दूना ,
आज किस नव चेतना में
चाहता हूँ व्योम छूना ,
क्यों लिपट अपमान से मन
कह रहा सम्मान मेरा । यह पुरातन ---
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