दीप ! आज दीवाली है, तुम्हारी पूँछ हुई ,
विशेष प्यार से
विशेष ध्यान से !
वैभव के इस संसार में..अट्टालिका के शिखर पर
आसीन हो ; शोभाव्रद्धि के साधन मात्र , छि: !
प्रसन्नता से झूम तो रहे हो बार-बार ; किन्तु
समस्त शक्ति का यूँ ही क्षय न हो जाय !
अर्द्ध-रात्रि में जब मानव संसार सुप्त होगा
तब प्राणशक्तिहीन तुम पुकारते ही रह जाओगे
निस्सहाय !
किंतु तुम्हारी पुकार भी तुमतक ही
रह जायेगी , बाती चढाने भी कोई न
आयेगा और ......
वायु के एक निर्मम झोंके में ही बह
जायगी तुम्हारी प्रसन्नता तुम्हारा
जीवन ,तुम्हारे वैभव का संसार .
दीपक ! मानव के मद भरे संसार में फँसे तो
हो किंतु भूल न जाना कि कहाँ से आये हो..
झोंपडी से ,
मिट्टी से !
विशेष प्यार से
विशेष ध्यान से !
वैभव के इस संसार में..अट्टालिका के शिखर पर
आसीन हो ; शोभाव्रद्धि के साधन मात्र , छि: !
प्रसन्नता से झूम तो रहे हो बार-बार ; किन्तु
समस्त शक्ति का यूँ ही क्षय न हो जाय !
अर्द्ध-रात्रि में जब मानव संसार सुप्त होगा
तब प्राणशक्तिहीन तुम पुकारते ही रह जाओगे
निस्सहाय !
किंतु तुम्हारी पुकार भी तुमतक ही
रह जायेगी , बाती चढाने भी कोई न
आयेगा और ......
वायु के एक निर्मम झोंके में ही बह
जायगी तुम्हारी प्रसन्नता तुम्हारा
जीवन ,तुम्हारे वैभव का संसार .
दीपक ! मानव के मद भरे संसार में फँसे तो
हो किंतु भूल न जाना कि कहाँ से आये हो..
झोंपडी से ,
मिट्टी से !
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