देवी लक्ष्मी ! ( विभवदायिनी )
आखिर तुम आ गईं
इठलाती हुई हर दीप-शिखा के साथ बल खाती हुई ,
किंतु तुम भूल गई
जहाँ दीपमालिका(महलों) ने हेम बिछाकर
तुम्हारा स्वागत किया वहाँ...
दौड पडी
नाच उठी
हर पग से झनकार बरसा दी
और जहाँ झोंपडी की टूटी चौखट
पर सिर झुकाए
बस एक दीपक ने विनय पूर्वक
न जाने कब की सहेजी फीकी
मुसकान बरबस छिटका दी वहाँ...
तनिक रुक भी न सकीं !
चुपके से, आँख बचाकर निकल आईं !!
मुडकर भी न देखा !!!
आखिर तुम आ गईं
इठलाती हुई हर दीप-शिखा के साथ बल खाती हुई ,
किंतु तुम भूल गई
जहाँ दीपमालिका(महलों) ने हेम बिछाकर
तुम्हारा स्वागत किया वहाँ...
दौड पडी
नाच उठी
हर पग से झनकार बरसा दी
और जहाँ झोंपडी की टूटी चौखट
पर सिर झुकाए
बस एक दीपक ने विनय पूर्वक
न जाने कब की सहेजी फीकी
मुसकान बरबस छिटका दी वहाँ...
तनिक रुक भी न सकीं !
चुपके से, आँख बचाकर निकल आईं !!
मुडकर भी न देखा !!!
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