शनिवार, 20 सितंबर 2014

चिरसंगी

---गतांक से आगे-

बोलो क्या मैं आज मान लूँ ,
जग  के  सभी  सहारे  छूटे ?
तृषित तड़पती धरती से क्या,
सजल सघन घन प्यारे रूठे ?

निविड़ तिमिरमय पथ के दीपक,
नभ  से  क्या  सब तारे  टूटे ?
झंझा  में  व्याकुल  नैया  से,
क्या  अब  निठुर  किनारे  छूटे ?
                            क्या  अपने  ही एक  नीड़  में,
                            आज अपरिचित मैं अनजाना?----मन में कसक--

मेघ तड़ित से परिचय पूछे !
जलिध न लहरों को पहचाने!
यह कैसा उपहास भला क्या !
नाद प्राण के गान न जाने !

दीपक आँचल ओट किया क्यों?
प्यार जताने या कि बुझाने ?
और कहूँ क्या कह न सकूँ अब,
बीत रही  सो मन  ही  जाने ,
                          स्निग्ध ज्योत्सना त्याग चुकी जब,
                          मुसका कर  पीयूष  पिलाना ।----मन में कसक यही---

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