मनुष्य ! तुम्हें e`xr`षणा क्यों प्यारी लगती है ?
e`x ------- मस्तिष्क शून्य पशु---क्या जाने कि
जिसके लिए दौडता है वह जलाशय नहीं--दहकती
हुई बालुका है
मस्तिष्क पर एकांत दावा रखने वाले तुम तो मनुष्य हो
तुम जब दौडते हो तब बार-बार एक चीत्कार तुम से
कहती है----मत दौडो -मिथ्या है !
फिर भी तुम नहीं मानते
गिरते हो बार-बार---पछताते भी हो अपनी मूर्खता पर.
किन्तु
फिर भी बाज नहीं आते मिथ्या का पीछा करने से
मनुष्य ! कहते हो कि पशु से श्रेष्ठ हो ?
इसी मिथ्या दम्भ का परिणाम है--
यह दौड .
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