जब वर्षा आती है तो कहाँ चली जाती है
तुम्हारी यह मनोहारिणी शांति ? गहन विचारों
जैसे बालुका-प्रस्त खंडो से उलझकर प्रवाहित
होते रहने वाले रव से भी जिस प्रशांत वातावरण
की स्रष्टि करती हो क्यों उसमें भीषण उथल पुथल
आ जाती है ?
यह सम ! यह सौंदर्य !!
वह भयावहता !
उफ, क्यों इतनी काली हो जाती हो ?
क्या है तुम्हारा स्वरूप ?
जानती हो ?
अवश्य !
तभी तो पुन: इस स्वरुप में लौट आती हो,
क्षणिक,नश्वर मिलन(भेंटों) से दूर -
सतत ,अनश्वर मिलन को
उत्सुकता से अग्रसर !
तुम्हारी यह मनोहारिणी शांति ? गहन विचारों
जैसे बालुका-प्रस्त खंडो से उलझकर प्रवाहित
होते रहने वाले रव से भी जिस प्रशांत वातावरण
की स्रष्टि करती हो क्यों उसमें भीषण उथल पुथल
आ जाती है ?
यह सम ! यह सौंदर्य !!
वह भयावहता !
उफ, क्यों इतनी काली हो जाती हो ?
क्या है तुम्हारा स्वरूप ?
जानती हो ?
अवश्य !
तभी तो पुन: इस स्वरुप में लौट आती हो,
क्षणिक,नश्वर मिलन(भेंटों) से दूर -
सतत ,अनश्वर मिलन को
उत्सुकता से अग्रसर !
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