१. ओ चुन्नी क्यों तू बदल गई
ऐ चुन्नी क्यों तू भटक गई
जाने कहां तू अटक गई
फैशन बाजों को खटक गई
गले से जा तू लिपट गई
या कंधे पर तू लटक गई
फैशन वालों के संग भटक
पथ छोड जुर्म है कर डाला
चुन्नी तूने क्या कर डाला
मर्यादा को ही धो डाला
२.जो चुन्नी यौवन ढकती थी
जो चुन्नी अदब सिखाती थी
इक यौवना भी इस चुन्नी में
बन नन्हीं सी दिख जाती थी
वो चुन्नी जाने कहां गई
फैशन की अंधी आंधी में
या पथ से चुन्नी भटक गई
या तन से कहीं छिटक गई
सब छिन्न भिन्न करके तूने
इक जोखिम नया बना डाला......चुन्नी तूने क्या
३.तेरी छाया मन भावन थी
तुझसे मर्यादा पावन थी
तू जब तक पथ पर कायम थी
हर इक के मन को भावन थी
तुझमें सपने रंग बिरंगे थे
हर इक के जो वे अपने थे
जिस तन पे तू पड जाती थी
वो देवी सी दिख जाती थी
अरे नासमझी में तूने
स्वयं अस्तित्व मिटा डाला.......चुन्नी
४.जिसने चेहरों को छाया दी
चंचल नैनों को माया दी
चेहरा चांद बना जिससे
जिससे बन जाते थे किस्से
बादल से केश ढके जिसमें
लटकन अटक रही इसमें
कहीं मुंह में तुझे दबा लिया
शर्मा मुंह तुझमें छुपा लिया
सब खुल्लम खुल्ला कर तूने
आकर्षण को ही खो डाला.......चुन्नी...
आकर्षण ही खो डाला चुन्नी... सुंदर रचना !!
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