रविवार, 30 जून 2013

पराश्रय(नीति धर्म)

पर निर्भर बुरा है, निज बल संबल होय.
बालक बूढे अपवाद, जानत हैं सब कोय.
पंगु असमर्थ होंय जो, उनकी करो सहाय.
नीति धर्म कहते यही, समझो मन चित लाय.
पराश्रय पकडे रहें जो, अमर बेल समजान.
बिन जड बीज प्रसार कर,मण्डप लेती तान.
आदि अंत तक व्रक्ष पर,उसका देख प्रसार.
क्रम-क्रम से रस चूस कर कर देती निस्सार.
वायु प्रकाश धूप सभी, जीवन के जो मूल
छोड देती उसको तब, हो वह नष्ट समूल
आश्रयदाता के प्राण, इस विधि प्रथमहि लेय
तब फिर निज सुवर्ण तनहि,मूर्ख भ्रष्ट तज देय
परावलम्बी जनों को,कहते कवि खल भ्रात
दूर रहना इनसे नित,मानो प्रिय यह बात

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