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शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

जीवनादर्श

क्षमा सुशान्ति दया को, समझ धर्म के मूल .
जो जन बर्तत जगत में, क्रोध करें ना भूल .
क्रोध पाप का मूल है ,जानो आग समान .
अंदर धधके आप खुद ,पर-तन काठहि जान.
अथवा यह कह डालिये,द्विविध तेज तलवार.
घातक बन खुद आपको,पर घातक भरमार.
खिसक जाय जल-बूँद ज्यों,जलज पात पर देख.
सहजहि बिनु देख ताप के,प्राणहि प्रभु-संग लेख.

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

ब्रह्म-अहं-अहंकार में पारिभाषिक भेद

ब्रह्म,अहं,अहंकारहि, सुनिये भेद सुजान.
सर्वत्र,सदा सुख शान्ति,सोइ ब्रम्ह महान.
असीम, प्रसरित,गहन ज्यों,जलधि नील अवलोक.
ब्रह्मदशा त्यों जानिये,दुख सन्ताप न शोक.
निर्गुण,निराकार और,अविकल्प निर्विकार.
साम्य दशा अवलोक किये,जानो ब्रम्ह विचार.
बेसुध,वेस्म्रत सा जबहि,स्तब्ध दशा में लीन.
यही ब्रह्म है, जानिये,रहे विकल्प विहीन.
ब्रहत् न दूजा और है,बालक ब्रह्म समान.
यही बताने नाम यह,रचा मुनिन मन आन.
अहं भाव अब देखिये,बालक करो विचार.
सुप्त दशा में बैठे जब,होता तब संसार.
यह ऐसा ही जानिये,समुद्र उठे तरंग.
तरंग बाद तरंग फिर,अनेक विधि बहुरंग.
इसी उथल पुथल को तब,कहते सगुण स्वरूप.
पूर्ण रूप निर्गुण रहे,वही ब्रम्ह सुर-भूप.
'अहं शेष' या 'आदि पद',कहें उसे हे बाल.
भज कर उसे बर्ते जो,पाते मुक्ति विशाल.
'अहं' सुपाधि होत है,कूपाधि 'अंहकार.
'अंह' स्रजक पद होत है,अन्य होत प्रतिंकार.
अंहकार से भी नीच,जानो तुम 'अभिमान'.
उसके वश वर्तते जो,पाते नर्क महान.
अतएव बालकगण प्रिय,रखना इस पर ध्यान.
भूलकर भी बंधु,करना नहिं अभिमान.
पतन-पाप का मूल वह,विनम्रता सुख मूल.
नम्र होकर बर्तो यदि,होय न भय के शूल.
मतलब इसका यह नहीं,सहन करो आतंक.
आतंक आदि को सदा,कुचलो तुम बेशंक.