किस उर को पीड़ा देने तुम
बसने आये थे हे ! माली
अति वेग उसे दे चले गये
पर दुनिया ऊजड़ कर डाली
- - -
वीणा के सोये तारो़ं को
क्यों आकर तुमने छेड़ दिया ?
चुप करने से पहिले ही क्यों
निर्दय ! अपना मुख फेर लिया ?
- - - -
क्या जानो क्या तुम छोड़ गये
मैं उसको बैठा हूँ लेकर !
पर अपना कौन ठिकाना है
प्रतिदान तुम्हारा यह लेकर !
- - - -
भूले केवल एक तेज कण ,
पर विस्तृत है कुछ मेरा भी !
प्रभु ! मेरे कैसे यह होगा
उज्जवलता और अंधेरा भी !
बसने आये थे हे ! माली
अति वेग उसे दे चले गये
पर दुनिया ऊजड़ कर डाली
- - -
वीणा के सोये तारो़ं को
क्यों आकर तुमने छेड़ दिया ?
चुप करने से पहिले ही क्यों
निर्दय ! अपना मुख फेर लिया ?
- - - -
क्या जानो क्या तुम छोड़ गये
मैं उसको बैठा हूँ लेकर !
पर अपना कौन ठिकाना है
प्रतिदान तुम्हारा यह लेकर !
- - - -
भूले केवल एक तेज कण ,
पर विस्तृत है कुछ मेरा भी !
प्रभु ! मेरे कैसे यह होगा
उज्जवलता और अंधेरा भी !
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें