रविवार, 4 अगस्त 2013

भक्त की आकाँक्षा(2)

                  (मदिरा सवैया)
राम बसे मन माहिं सदा अरु,दीप जले नित Kkन हिये.
शील दया क्षमता भर सुन्दर,पात्र सदा मधु पान किये.
कर्म करूँ नित लोक-हितेच्छुक,और सभी कुछ दान किये.
प्रेम भरा जब डोल फिरूँ तब,क्या जग में फल और जिये.

भक्त की आकांक्षा(1)

वास करो प्रभु मुझमें तुम,में लीन रहूँ तुझ में.
जीवन का बस सार यही,प्रभु वास रहे मुझ में.
उठे न मन अभिमान कभी,अब हे जगदीश जरा.
पतन मूल वह,सत्य सदा,यह शास्त्र प्रमाण खरा.

शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

जीवनादर्श

क्षमा सुशान्ति दया को, समझ धर्म के मूल .
जो जन बर्तत जगत में, क्रोध करें ना भूल .
क्रोध पाप का मूल है ,जानो आग समान .
अंदर धधके आप खुद ,पर-तन काठहि जान.
अथवा यह कह डालिये,द्विविध तेज तलवार.
घातक बन खुद आपको,पर घातक भरमार.
खिसक जाय जल-बूँद ज्यों,जलज पात पर देख.
सहजहि बिनु देख ताप के,प्राणहि प्रभु-संग लेख.

रविवार, 28 जुलाई 2013

पूजा का ढोंग

               कैसे भेंट तुम्हारी ले लूँ !
घन्टा झालर बजा-बजा कर, सोते को ज्यों जगा जगा कर,
       त्रिपुण्ड भारी लगा लगा कर , फूल मिठाई बता बता कर,
कहते मुझको भर के थारी,ले लूं ! कह दो कैसे भेंट तुम्हारी ले लूं !!
       लगा लंगोटी भस्म रमा कर,जटा जूट शिखा बढा कर,
गला फाड भी चीख चिलाकर,ढोंगों की बस! इसी बिना पर,
       कहते मुझसे भर के थारी ले लूं ! कह दो कैसे भेंट तुम्हारी ले लूं !!
तरष्णा ज्वाला जलती फर-फर, डाह दरांती चलती कर- कर,
       काम-क्रोध-नद बहकर खर-खर,प्रेम शांति को ढाता भर-भर,
फिर भी कहते भर के थारी ले लूं !कह दो कैसे भेंट तुम्हारी ले लूं !!
       ह्रदय स्त्रोत के प्रेम कुण्ड पर,विकस कज्ज हों भव्य भावभर,
भक्ति Kन जब रहे वास तर,गुज्ज भ्रंग बन आत्म चाव कर,
मैं ही वह हूँ फिर क्या थारी ले लूं ! कह दो कैसे भेंट तुम्हारी ले लूं !!

     

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

ब्रह्म-अहं-अहंकार में पारिभाषिक भेद

ब्रह्म,अहं,अहंकारहि, सुनिये भेद सुजान.
सर्वत्र,सदा सुख शान्ति,सोइ ब्रम्ह महान.
असीम, प्रसरित,गहन ज्यों,जलधि नील अवलोक.
ब्रह्मदशा त्यों जानिये,दुख सन्ताप न शोक.
निर्गुण,निराकार और,अविकल्प निर्विकार.
साम्य दशा अवलोक किये,जानो ब्रम्ह विचार.
बेसुध,वेस्म्रत सा जबहि,स्तब्ध दशा में लीन.
यही ब्रह्म है, जानिये,रहे विकल्प विहीन.
ब्रहत् न दूजा और है,बालक ब्रह्म समान.
यही बताने नाम यह,रचा मुनिन मन आन.
अहं भाव अब देखिये,बालक करो विचार.
सुप्त दशा में बैठे जब,होता तब संसार.
यह ऐसा ही जानिये,समुद्र उठे तरंग.
तरंग बाद तरंग फिर,अनेक विधि बहुरंग.
इसी उथल पुथल को तब,कहते सगुण स्वरूप.
पूर्ण रूप निर्गुण रहे,वही ब्रम्ह सुर-भूप.
'अहं शेष' या 'आदि पद',कहें उसे हे बाल.
भज कर उसे बर्ते जो,पाते मुक्ति विशाल.
'अहं' सुपाधि होत है,कूपाधि 'अंहकार.
'अंह' स्रजक पद होत है,अन्य होत प्रतिंकार.
अंहकार से भी नीच,जानो तुम 'अभिमान'.
उसके वश वर्तते जो,पाते नर्क महान.
अतएव बालकगण प्रिय,रखना इस पर ध्यान.
भूलकर भी बंधु,करना नहिं अभिमान.
पतन-पाप का मूल वह,विनम्रता सुख मूल.
नम्र होकर बर्तो यदि,होय न भय के शूल.
मतलब इसका यह नहीं,सहन करो आतंक.
आतंक आदि को सदा,कुचलो तुम बेशंक.

रविवार, 30 जून 2013

बाल्यकालीन केल्यानन्द

नहीं छेडना भइया को तुम,
                     लगा खेल में घरघूला के.
मनोयोग से बना रहा वह,
                     घर,आंगन,बगिया धूला के.
रचना अपनी उसको प्यारी,
                     जग में जिस विधि सबको.
स्रष्टि खेल से करते ममता,
                     भगवन भी,तब दोष न उसको.
विघ्न किया यदि तुमने उसका,
                     याद रखो तुम खैर न होगी.
लौंच तान कर बिगडेगा जब,
                     झंझट बढकर आफत होगी.
नियम तोडकर भगवन के कब,
                     कौन सुखी नर रह है पाता.
दुख रोगों से दण्डित होकर,
                     म्रत्यु- दण्ड फिर वह है पाता.
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केल्यानन्द.....शैशवकाल के पश्चात् मानव-जीवन का दूसरा चरण बाल्य काल प्रारम्भ होता है.शिशु में लौकिक
द्रष्टि से अहँ भाव का उन्मीलन प्रारम्भ होता है, और इसीलिए बालक के कार्यों में केलि(खेल) का ही प्राधान्य 
रहता है. यदि अहँ-सुषुप्त स्थिति का नाम 'ब्रह्म' उपयुक्त है तो बाल्य कालीन इस अहँ-उन्मीलन शक्ति को 'ईश्वर'
कहना ही ठीक जँचता है. तभी तो स्रष्टि को ईश्वर का खेल,केलि,क्रीडा या लीला कहा जाता है.

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                   

पराश्रय(नीति धर्म)

पर निर्भर बुरा है, निज बल संबल होय.
बालक बूढे अपवाद, जानत हैं सब कोय.
पंगु असमर्थ होंय जो, उनकी करो सहाय.
नीति धर्म कहते यही, समझो मन चित लाय.
पराश्रय पकडे रहें जो, अमर बेल समजान.
बिन जड बीज प्रसार कर,मण्डप लेती तान.
आदि अंत तक व्रक्ष पर,उसका देख प्रसार.
क्रम-क्रम से रस चूस कर कर देती निस्सार.
वायु प्रकाश धूप सभी, जीवन के जो मूल
छोड देती उसको तब, हो वह नष्ट समूल
आश्रयदाता के प्राण, इस विधि प्रथमहि लेय
तब फिर निज सुवर्ण तनहि,मूर्ख भ्रष्ट तज देय
परावलम्बी जनों को,कहते कवि खल भ्रात
दूर रहना इनसे नित,मानो प्रिय यह बात