शनिवार, 29 जून 2013

बूंदें पाती की

हम तुम सब ही फंसे हुए हैं जीवन के संग्राम में
फिर भी याद किया सबने ऐसी भागम भाग में
मधुमय सहज सरस शब्दों से पाती में प्यार भरा
हर्षित हुआ हर इक मन याद आया हर पल गुजरा
दिल के किसी कोने में यूं ही जगह बना रखना
यूं ही कुछ बूंदें पाती की आ जायें बन के झरना
चलें शब्द यूं कदमों से और यूं आपस में बातें हों
जीवन संकट कट जाते हैं जब शब्दों का सम्बल हो
चंद शब्दों की लडियां मैं भी मन से प्रेषित करता हूँ
स्वीकार करो हे मान्यवर ये तुमको अर्पण करता हूँ

रविवार, 2 जून 2013

पिता को पत्र के अंश

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सोमवार, 20 मई 2013

'समरथ को नहीं दोष गुसाईं' एक द्रष्टि

श्री तुलसीदास जी ने उनके मन में प्रतिष्ठित श्री हरि राम के चरित्र को आधार बनाकर तत्कालीन संकटग्रस्त हिन्दू समाज की रक्षा हेतु उसके पथ-प्रर्दशक बनकर उच्च आदर्शों वाले समाज के निर्माण के लिए प्रसिद्ध काव्य ग्रन्थ 'श्री रामचरित्र मानस' की रचना की .
                                                                       हिन्दू समाज के पथ-प्रदर्शक कवि तुलसीदास जी ने रामचरित्र मानस के बाल काण्ड में निम्न पंक्तियों का उल्लेख किया है..

               'समरथ को नहीं दोष गुसाईं ,रवि पावक सुरसरि की नाई'

उक्त पंक्तियों में 'समरथ को नहीं दोष गुसाईं' का वास्तविक अर्थ न जानते हुए अथवा जानबूझकर समाज के सबल व निर्बल अपने-अपने पक्ष को पुष्ट करने के लिए इन पंक्तियों का उपयोग करते चले आ रहे हैं.
साधारणतः समाज में इसका यह अर्थ लगाया जाता है कि समर्थवान के दोष को नहीं देखना चाहिए अथवा समर्थवान त्रुटि करने पर भी निर्दोष है अथवा समर्थवान दोष रहित होता है . दोषी सदैव कमजोर ही होता है अथवा सिध्द कर दिया जाता है. 
                                                 अर्थ का अनर्थ कर-कर के लोगों ने इन पंक्तियों के वास्तविक अर्थ को विलुप्त कर दिया अथवा समाज के समर्थवान लोगों ने स्वयं अथवा उनके चाटुकारों ने तुलसीदास जी की उक्त पंक्तियों का अवलम्ब लेकर समाज को शक्तिशाली की शक्ति का एहसास दिलाने की कोशिश की. और इसी कारण तुलसीदास जी पर आरोपों की झडी लगाकर उन्हें सामंतशाही व्यवस्था का पक्षधर तक कह दिया. लेकिन लोगों ने यह नहीं सोचा जिस तुलसीदास के काव्य ग्रन्थ का आधार श्री हरिराम का चरित्र और उच्च आदर्शों वाले समाज की कल्पना हो उनकी सोच इतनी छोटी नहीं हो सकती. 

वास्तविक अर्थ पर एक द्रष्टि का प्रयास....'समरथ को नहीं दोष गुसाईं'...समरथ(सम् +अर्थ) में पशुबल अथवा बाहुबल का भाव नहीं . उसमें भाव आत्मबल का है. जो कर्मो व विचारों से दोष रहित हो .जिसके कर्म भेद- भाव वाली बुद्धि से प्रेरित नहीं होते .इसीलिए उन्होने आगे कहा कि 'रवि पावक सुरसरि की नाई' इनके कार्य भी भेदभाव रहित ही हैं.जो दोष रहित वही समर्थवान है. ईश्वर के अलावा दोषरहित दूसरा नहीं .इसीलिए समर्थवान और सर्वशक्तिमान सिर्फ एक वही है जो दोष रहित है .गीता में भी कहा गया है 'निर्दोषं हि समं ब्रह्म'. अतः इस भौतिक जगत में यदि कोई वास्तव में दोष रहित है तो उसे भी समर्थवान समझा जा सकता है .

रविवार, 19 मई 2013

सिसकता प्रजातंत्र

सिसक रहा है प्रजातंत्र तडफ रहा अपना वतन
आजादी की आत्मा का लुट रहा देखो चमन......
 १      न सोओ ओ नौ जवानो जागकर ललकार दो
        लूटते हैं देश जो तुम उनकी खाल उतार लो
       रोडे बन जायं राह में कर दो मिट्टी में दफन.......आजादी की आत्मा....
२     राजे महराजे हैं सब नेता अफसर रुप में
        लुट रही है जनता देके कर अनेकों रुप में
        नेता अफसर मौज में मंहगाई तेरे सिर वजन.......आजादी.........
३      खुद की जेबें भरते हैं जो लूट इस देश को
        बेशर्मों की खाल मोटी आ खडे फिर वोट को
        आदमखोर बन गए जो कर दो तुम उनका दमन........आजादी.....
४      भगतसिंह बन जाओ कोई बन जाओ आजाद
         राजगुरू,सुभाषबोस की आत्मा करे फरियाद
         क्यों मौन हो जवानों बचालो अपना ही वतन..........आजादी.....
५      आग धधकती सीने में है रक्षा वतन की मन में
         एक क्रान्ति और चाहिए अब चाहत है जन-जन में
         आगे आओ साथ-साथ ओढना है फिर कफन..........आजादी की आत्मा का लुट रहा देखो चमन

शनिवार, 11 मई 2013

क्रांतिवीर अवतार धरो

भोर की किरणों में पहली सी लाली अब कहां
सूर्य में भी तपीश की वो तपिशता अब कहां
ढलता सूरज चांदनी और रात भी है उदास                                                                                                  हवा है बहकी हुई मौसम भी हो गया खराब
सब कुछ बदला सा है सहमी सहमी रात है
हर किसी के दिल के अंदर ऐ कैसी आग है
देश भक्ति मात्र भूमि भावनायें सब खो गईं
तरुणों की तरुणाई भी शायद अब है सो गई
ठंडी बियर से खून भी लोगों का ठंडा हो गया
नेताओं का चरित्र भी आदिम सा नंगा हो गया
न्याय की आसंदी जख्मी खुद ही न्याय मांगती
संसद के गलयारे अब त्राहीमाम पुकारते
आओ क्रान्तिवीर फिर आओ अब अवतार धरो
भारत माँ पुकार रही भारत माँ पुकार रही

सोमवार, 6 मई 2013

भारतीय प्रजातंत्र या "पार्टीतंत्र"

प्रजातंत्र को परिभाषित करते हुए कहा जाता है कि यह जनता का,जनता के द्वारा एवं जनता के लिए शासन है.     "प्रजा का शासन" में "प्रजा"का अर्थ सम्पूर्ण देश की प्रजा से ही है. लेकिन भारतवर्ष में उसका उपयोग उसके इसी अर्थ का बार-बार गुणगान प्रजा के मन को तुष्ट करने,उसे सम्बल देने या स्पष्ट कहूँ तो प्रजा को भ्रमित कर   उसे मूर्ख बनाकर उस पर शासन करने के लिए किया जाता है. प्रजातंत्र  के अर्थ के अनुरूप प्रजातंत्र भारत में न तो है और न ही इसकी सम्भावना ही दिखाई देती है. स्वतंत्र भारत का प्रजातंत्र स्वतंत्र न होकर परतंत्र(पराधीन) होकर रह गया है . प्रत्यक्ष में तो यह प्रदर्शित किया जाता है कि भारत जैसा प्रजातंत्र दुनिया में कहीं नहीं है लेकिन अप्रत्यक्ष में भारतीय प्रजातंत्र सहमा,ठिठका,कमजोर,मजबूर,असहाय अवस्था में पहुंच कर विक्रत हो पार्टियों के आधीन हो गया है .
       भारतीय राजनैतिक पार्टियां कुकरमुत्तों की तरह ऊगती जा रही हैं . ये पार्टियां क्षेत्रीय हों या राष्ट्रीय अपना आधार बढाने के लिए सदस्य बनाने का अभियान चलाती हैं . पार्टियों के सदस्य बनने के पश्चात सदस्यगण अपनी अपनी पार्टी के प्रति वफादारी की शपथ लेते हैं . प्रत्यक्ष में दिखावे के लिए सभी देश हित में अपना बलिदान देने के लिए तत्पर दिखाई देते हैं लेकिन वास्तव में अब कोई विरला ही होगा जो देश के प्रति निष्ठा,समर्पण एवं वफादार होने का जज्बा अपने मन में रखता होगा ,जो रखता होगा उसे किनारे लगाकर ठिकाने लगा दिया जाता है . अधिकांश लोग स्वार्थवश ही सदस्य बनते हैं  स्वयं का आधार मजबूत होते ही  "मैं" पर ध्यान केन्द्रित हो जाता है और फिर शुरू होता है एक नया खेल मैं और मेरी पार्टी ,देश जाये भाड में.
क्योंकि स्वार्थ की पूर्ति पार्टी के माध्यम से ही होनी है.और यदि यह कहा जाये तो अतिश्योक्ति न होगी कि आजकल पार्टियां शासन करने की भावना रखने वाले स्वार्थी लोगों का समूह मात्र बनकर रह गईं हैं.
 अब देश पार्टियों एवं उनके बढते सदस्यों की संख्या में बटता चला जा रहा है. कई स्थानों में विभिन्न पार्टियों के सदस्यों के मध्य कटुता बढती जा रही है इसीलिए सांप्रदायिकता,जाति भेद के बाद अब पार्टी भेद भी दिखाई देने लगा है. "इससे ऐसा भी प्रतीत होता है कि आगे जाकर स्थति इतनी विकट भी हो सकती है कि पार्टियों के प्रति समर्पण व निष्ठा  से एक पार्टीगत विशिष्ट वर्ग की उत्पत्ति न हो जाये. और व्यक्ति अति उत्शाह में या चापलूशीवश  अपनी जाति, धर्म,गोत्र आदि बदल दें या त्याग दें. यथा व्यक्ति अपना नाम राजेन्द्र 'शर्मा' के स्थान  पर राजेन्द्र 'कांग्रेस' एवं जगदीश 'दुबे' के स्थान पर जगदीश 'भाजपा' न लिखने लगें . आगे-आगे यह विभाजन इस हद तक पहुँच जाये कि ये एक दूसरे के वर्ग में शादियां ही न करें .
                                                                                                             वास्तव में पार्टियों के सदस्यों की सदस्यता का यह विस्तार प्रजातंत्र के लिए घातक हो सकता है क्योंकि सदस्यों की सोच विचार पार्टी हित और सिर्फ पार्टी हित तक ही सीमित होता है यह सब स्वार्थवश ही होता है .देश भक्त तो कोई सिरफिरा ही होता है.देश में स्वतंत्र सोच के व्यक्ति अर्थात प्रजातंत्र की प्रजा नहीं बचेगी सिर्फ पार्टियों के सदस्यों का समूह होगा जो अपनी पार्टी के साथ ही खडा दिखाई देगा. स्वतंत्र सोच विचार के लोगों का होना प्रजातंत्र की रक्षा व देश और समाज हित के लिए आवश्यक है .इनकी संख्या जितनी ज्यादा होगी उतना ही प्रजातंत्र सुरक्षित रहेगा .आज के भारत में प्रत्येक राजनैतिक पार्टी का सदस्य अपने पार्टी के एजेंडे के साथ खडा दिखाई देता है .समाज व देश के विघटन या दुर्दशा की उन्हें फिक्र नहीं .हर हाल में मौत प्रजातंत्र की ही होनी है .
                                                                                                                प्रत्येक राजनैतिक पार्टी की ओर से उनके सदस्य व समर्थकों को विभिन्न प्रकार के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष लाभ समय-समय पर प्राप्त होते रहते हैं और मूल रूप से वर्तमान में अधिकांश व्यक्ति इस लाभ हेतु ही पार्टियों से जुडते और वफादारी प्रगट करते हैं . भ्रष्टाचार का मूल कारण यहीं से आरम्भ होता है . अनैतिक व अवैध कार्यों की उत्पत्ति व पोषण भी यहीं से होता है. अपने समर्थकों के आधार को मजबूत व स्थिर बनाने के लिए क्या-क्या नहीं किया और होने नहीं दिया जाता यह जन साधारण से छुपा नहीं है लेकिन कोई बोलकर अपनी और अपने परिवार की जान खतरे में क्यों डालेगा.
             प्रजातंत्र की रक्षा के लिए सुसुप्त पडे समाज को गहरी नींद से जगना व जगाना होगा क्योंकि सत्ता का रस पीने वाले स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाडी मारने के लिए स्वमेव ही कोई कठोर कदम उठाकर कानूनी सुधार करेंगे ऐसी आशा करना व्यर्थ ही है वे स्वयं पर कोई अंकुश बर्दास्त नहीं कर सकते . अन्ना हजारे का क्या हाल हुआ सारी दुनिया ने देखा . इस देश की जनता प्रजातंत्र का अर्थ नहीं समझती और न ही समझना ही चाहती है . प्रजातंत्र अपनी रक्षा के लिए अपनी प्रजा से त्याग मांगता है. लेकिन राजनेताओं और सरकारों ने जनता को भौतिकता में इतना डुबो दिया है कि त्याग नाम से ही जान निकल जाती है . शराब की खुली छूट है खूब पियो और इतने मदहोश रहे आओ कि सरकारें क्या गलत कर रहीं हैं इसका न तो भान रहे और न ही ध्यान रहे और फिर निर्विघ्न टी.वी. व फिल्मों की ऐसी नग्नता में खो जाओ जिसे देखकर विदेशी भी शर्मा जायें. यह सब बडे ही प्रयोजित तरीके से किया जा रहा है . सरकार चलाने वालों का सीधा इशारा है कि सरकार जनता के खाने-पीने ,उठने-बैठने बोलने और मौज-मस्ती में बाधा नहीं बनेगी जनता उनके शासन चलाने में बाधा न डाले.
                    इस हेतु उन कानूनी सम्भावनाओं को खोजना होगा जो यह निर्धारित करने में सहायक हों कि कितनी निर्धारित आबादी पर कितनी पार्टियाँ होनी चाहिए ,कितनी आबादी पर किसी पार्टी की सदस्य संख्या कितनी निर्धारित हो .किसी भी पार्टी का किसी भी प्रकार सदस्य बनते समय प्रत्येक सदस्य अपनी आर्थिक स्थति का विवरण दे और प्रतिवर्ष विवरणी भी भरकर चुनाव आयोग को देवे . जिसके मन आ रहा है वही पार्टी बनाकर तैयार खडा है. सारा देश पार्टियों एवं उनके सदस्यों में बंटकर रह जायेगा . प्रजा रहेगी नहीं तो प्रजातंत्र भी नहीं रहेगा बल्कि वह "पार्टी-तंत्र" हो जायेगा ............आपके सुझावों का स्वागत है. ....काव्य खण्ड में पढें "सिसकता प्रजातंत्र"